सिंगापुर घूमने का सपना भला कौन नहीं देखता? इसकी चकाचौंध, शॉपिंग स्ट्रीट्स और लाजवाब लोकल फूड किसी को भी आकर्षित कर सकते हैं। बजट की कमी अक्सर इस सपने के आड़े आती है, लेकिन अगर आप चालाकी से ट्रिप प्लान करें तो सिंगापुर को चार दिन तक मुफ्त में एक्सप्लोर किया जा सकता है। सिंगापुर सरकार भारतीय यात्रियों के लिए एक खास ’96-घंटे वीजा-फ्री ट्रांजिट’ (VFTF) सुविधा देती है, जो उन लोगों के लिए बेहतरीन है जो सिंगापुर को ले-ओवर स्टॉप बनाकर किसी तीसरे देश की यात्रा कर रहे होते हैं।
इस सुविधा का लाभ उठाना रॉकेट साइंस नहीं है, बस कुछ शर्तों को समझना जरूरी है। अगर आप भारत से ऑस्ट्रेलिया, जापान या अमेरिका जैसी जगहों पर जा रहे हैं और बीच में सिंगापुर में रुकते हैं, तो आप इसके हकदार हो सकते हैं। आपके पास आगे की कन्फर्म फ्लाइट टिकट होनी चाहिए जो सिंगापुर आगमन के 96 घंटों के भीतर की हो। साथ ही, कुछ देशों का वीजा या लॉन्ग-टर्म परमिट भी अनिवार्य हो सकता है। इमीग्रेशन एंड चेकपॉइंट्स अथॉरिटी (ICA) के अधिकारी एयरपोर्ट या एंट्री पॉइंट पर आपके दस्तावेज देखते हैं और मौके पर तय करते हैं कि आप इस सुविधा के लिए एलिजिबल हैं या नहीं।
सिंगापुर की इस इमीग्रेशन व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत उसकी रफ्तार और तकनीक है। वहां काम इंसानों से ज्यादा ऑटोमेशन और फेशियल रिकग्निशन पर निर्भर करता है। हाल ही में ए-सनमरीन इंजीनियरिंग के सीएफओ वेंकट पटाकोटा ने अपने अनुभव को सोशल मीडिया पर साझा किया, जो इस अंतर को बखूबी बयां करता है। उन्होंने बताया कि कैसे सिंगापुर में महज 45 सेकंड में इमीग्रेशन पूरा हो गया, जबकि भारतीय एयरपोर्ट्स पर यही प्रक्रिया 45 मिनट तक खिंच गई।
भारत में लंबी कतारें, कम अधिकारी और ऊपर से यात्रियों का मनमाना व्यवहार—सब कुछ मिलकर एक खराब अनुभव बनाता है। वेंकट ने जिक्र किया कि कैसे वहां मौजूद दो अधिकारियों के भरोसे इतनी बड़ी भीड़ थी और कई यात्री अपनी बोर्डिंग का हवाला देकर लाइन तोड़ रहे थे। सिर्फ इमीग्रेशन ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य घोषणा पत्र जैसी औपचारिकताएं भी भारत में काफी अव्यवस्थित लगती हैं, जहां ऑनलाइन सबमिशन के बाद भी फिजिकल सिग्नेचर के लिए कोई जिम्मेदारी लेने वाला नहीं दिखता।
इस बहस के दूसरी तरफ इंटरनेट की अपनी राय है। कई लोग सलाह दे रहे हैं कि भारत में ‘फास्ट ट्रैक इमीग्रेशन-ट्रस्टेड ट्रैवलर प्रोग्राम’ (FTI-TTP) जैसी सुविधाएं अपनाई जाएं ताकि चीजें आसान हो सकें। कुछ यात्रियों का यह भी मानना है कि भारत में अब भी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स को बाहर निकलवाना और शारीरिक जांच जैसी पुरानी परंपराएं चल रही हैं, जबकि दुनिया के कई अन्य बड़े एयरपोर्ट्स अब इन झमेलों से काफी आगे निकल चुके हैं। कुल मिलाकर, सिंगापुर की रफ्तार एक बेंचमार्क है, और भारत को अपने सिस्टम को दुरुस्त करने के लिए अभी काफी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।




